Sketched by मुहम्मद शाहिद खान
परदेसी संग न लाइए यारी भानवे लाख सोने दा होवे
एक गल लो परदेसी चंगा जद याद करे तद रोवे
सोनिये ओए हीरिये ओए
तेरी याद ने आन सताया डांढ़ा फाया (फिल्म गुलबलोच -1943)
यही था रफ़ी साहब का गया पहला गाना
अशरफ खान, गली न. 27, मकान न. बी 11,कैनाल पार्क गुलबर्ग (दोयम), लाहौर.....
दोस्तो, मोहम्मद रफ़ी साहब के मेहरबान दोस्तों और सरपरस्तों की अव्वलतरीन शफ में जिन लोगों का नाम आता है अशरफ खान साहब उनमें से एक हैं। अशरफ खान साहब, लाहौर में रफ़ी साहब के करीब ही रहा करते थे। रफ़ी साहब उन के साथ रियाज़ वगैरह किया करते थे।
अशरफ खान साहब उन दिनों "गुलबलोच" फिल्म में बतौर चीफ असिस्टेंट काम कर रहे थे। उन दिनों उन का एक पख्तून सिंगर और साजिंदा अफगानिस्तान चला गया था। नए सिंगर की दरक़ार थी। रफ़ी साहब की गायकी से भी अशरफ साहब बखूबी वाकिफ थे। अशरफ साहब, रफ़ी साहब को 'ज़ीनत बेगम' के घर "हीरा मंडी" ले गए और बोले ये रफ़ी है। ज़ीनत बेगम ने कहा "मैं एंनु जांनिया, आंदा हुँदा है कदी कदी" (मैं इस को जानती हूँ, कभी कभी आता रहता है) अशरफ साहब बोले "तुस्सी सुनो तो सही ऐनु.... मैं चहुँदा ए त्वाड्डी फिल्म विच गाये"। (तुम सुनो तो सही इसको, मैं चाहता हूं कि ये आप की फिल्म में गाए)
ज़ीनत बेगम बोलीं "गावंदा सोना है, पर ताल नु नहीं समझ दा" (गाता तो अच्छा है, पर ताल को नहीं समझता)
अशरफ साहब बोले "की ग़ल्ला करदे पये हो, मैं जांनिया तुस्सी सब ठीक कर लेणे हो"। (क्या बात कर रहे हो, मैं जनता हूँ आप सब सही कर लोगे)
दो-तीन दिन रफ़ी साहब ने ज़ीनत बेगम के साथ रियाज़ किया और सब ठीक हो गया लेकिन आखिरी फैसला नज़ीर साहब को लेना था। 2-4 दिन बाद नज़ीर साहब बॉम्बे से लाहौर आये और रफ़ी साहब को सुना।
रफ़ी साहब की आवाज़ उनको बहुत पसंद आयी। मामूली नुक्ताचीनी के बाद सब कुछ फाइनल हो गया।
100 रुपए देकर रफ़ी साहब को मुंबई बुलाया गया और इस तरह रफ़ी साहब को पहला ब्रेक मिला, जिस में अशरफ खान साहब का बहुत बड़ा हाथ था। 'गुलबलोच' फिल्म 23 अगस्त 1943 को लाहौर के 'क्राउन सिनेमा' में रिलीज़ हुई।
"लाहौर से बाम्बे" -1942
के एल सहगल साहब के स्टेज शेयर, फिर रेडियो और गुलबलोच में गाने के बाद भी रफ़ी साहब महफ़िल और मेले वगैरह में कभी कभी गाते थे। मगर हमीद साहब (रफ़ी साहब के बड़े भाई के दोस्त) इस से मुतमईन नहीं थे और सोचते की रफ़ी साहब लाहौर में कुछ खास नहीं बन पायेंगे। वो चाहते थे की रफ़ी साहब और भी ऊँचा मुकाम हासिल करें और सारी दुनिया में रफ़ी साहब का नाम रोशन हो। एक मौका भी था, म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुंदर उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड देकर बॉम्बे आने की दावत दे चुके थे। मगर सब से बड़ी दिक्कत उनके वालिद साहब से थी जो गाने-बजाने के बिल्कुल खिलाफ थे। लेकिन मोहम्मद दीन साहब और हमीद भाई ने काफी समझाइश के बाद रफ़ी साहब के वालिद को राज़ी कर लिया। रफ़ी साहब की वालिदा हमेशा रफ़ी साहब की हौसला अफजाई किया करतीं थीं। उन्होंने एक तकिये में चने (Bangal Garam) भर कर रफ़ी साहब को दिए और दिल से उनकी कामयाबी की दुआ दी।
उन दिनों लाहौर से कोई सीधी ट्रैन बंबई नहीं आती थी चुनांचे पहले पेशावर जाना पड़ा, वहां से फ्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिये ट्रेन में हमीद साहब के हमराह सवार हुए। सिद्दीक़ साहब (रफ़ी साहब के छोटे भाई) और कुछ दोस्त उनको छोड़ने के लिए आये, इस तरहा रफ़ी साहब का मुंबई आने का मरहला मुक्कमल हुआ...
दोस्तो, जब रफ़ी साहब लाहौर से बॉम्बे पहुंचे तो काफी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। पहले तो बामुश्किल रहने का ठिकाना मिला।
फिलहाल रहने का ठिकाना तो मिला पर वहां पर रियाज़ करना मुश्किल काम था।
लाहौर से अपने साथ 3-4 गिलाफ तकिये (Pillow cover) में चने भर कर लाये थे वही खा कर गुज़ारा करते और रियाज़ के लिए चौपाटी चले जाते, वहां जा कर घंटों रियाज़ करते।
हमीद साहब, रफ़ी साहब के लिए काम की तलाश करते। एक दिन दोनों "दादर" इलाके से गुजर रहे थे की उन्होंने म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुन्दर को कार में जाते हुए देखा। दोनों ने उनका पीछा किया। श्याम सुन्दर जी रिकॉर्डिंग स्टूडियो (रणजीत स्टूडियो) में दाखिल हो गए। जब हमीद भाई ने स्टूडियो में जाने की कोशिश की तो दरबान ने उनको जाने से रोक दिया।
रफ़ी साहब ने अपनी जेब से श्याम सुन्दर का विजिटिंग कार्ड दरबान को दिया, उसके बाद श्याम सुन्दर जी से मुलाक़ात हुई और तब जा कर रफ़ी साहब ने श्याम सुन्दर के संगीत में अपना दूसरा और हिंदी फिल्म में पहला गाना फिल्म "गांव की गोरी" (1944) के लिए रेकॉर्ड किया। (हालाँकि नौशाद साहब के म्यूजिक में बनी फिल्म "पहले आप" (1944) "गांव की गोरी" से पहले रिलीज़ हुई) और इस तरहा रफ़ी साहब का पहली बार हिंदी फिल्म में गाने का मरहला पूरा हुआ।
और इस के बाद रफ़ी साहब ने करीब 1960 से भी जायदा फिल्मों मैं गाने गाये आज रफ़ी साहब इस दुनिया मैं नहीं लेकिन आज भी उनके के गीत नैतिक सामाजिक और भावनात्मक अवमूल्यन के इस दौर में गीत जनमानस को इंसानियत, इंसानी रिश्तों, नैतिकता और सामाजिक सद्भाव के लिए प्रेरित करते हैं। देश के एकता और अखंडता को मजबूत करते हैं। रफ़ी साहब साम्प्रदायिक सौहार्द का मजबूत प्रतीक हैं। 38 साल गुजरने के बाद भी लोग ऑन को दिल से सुनते हैं और याद करते रफ़ी साहब जैसे कलाकार कभी मरते नहीं वो अमर हैं हम सब के दिल मैं हमारी यादों मैं और उन के गाए गीतों मैं। .. "जोए रफ़ी साहब "
दीवाना ए मुहम्मद रफ़ी
मुहम्मद शाहिद खान " जयपुरी "
जयपुर - राजस्थान
परदेसी संग न लाइए यारी भानवे लाख सोने दा होवे
एक गल लो परदेसी चंगा जद याद करे तद रोवे
सोनिये ओए हीरिये ओए
तेरी याद ने आन सताया डांढ़ा फाया (फिल्म गुलबलोच -1943)
यही था रफ़ी साहब का गया पहला गाना
अशरफ खान, गली न. 27, मकान न. बी 11,कैनाल पार्क गुलबर्ग (दोयम), लाहौर.....
दोस्तो, मोहम्मद रफ़ी साहब के मेहरबान दोस्तों और सरपरस्तों की अव्वलतरीन शफ में जिन लोगों का नाम आता है अशरफ खान साहब उनमें से एक हैं। अशरफ खान साहब, लाहौर में रफ़ी साहब के करीब ही रहा करते थे। रफ़ी साहब उन के साथ रियाज़ वगैरह किया करते थे।
अशरफ खान साहब उन दिनों "गुलबलोच" फिल्म में बतौर चीफ असिस्टेंट काम कर रहे थे। उन दिनों उन का एक पख्तून सिंगर और साजिंदा अफगानिस्तान चला गया था। नए सिंगर की दरक़ार थी। रफ़ी साहब की गायकी से भी अशरफ साहब बखूबी वाकिफ थे। अशरफ साहब, रफ़ी साहब को 'ज़ीनत बेगम' के घर "हीरा मंडी" ले गए और बोले ये रफ़ी है। ज़ीनत बेगम ने कहा "मैं एंनु जांनिया, आंदा हुँदा है कदी कदी" (मैं इस को जानती हूँ, कभी कभी आता रहता है) अशरफ साहब बोले "तुस्सी सुनो तो सही ऐनु.... मैं चहुँदा ए त्वाड्डी फिल्म विच गाये"। (तुम सुनो तो सही इसको, मैं चाहता हूं कि ये आप की फिल्म में गाए)
ज़ीनत बेगम बोलीं "गावंदा सोना है, पर ताल नु नहीं समझ दा" (गाता तो अच्छा है, पर ताल को नहीं समझता)
अशरफ साहब बोले "की ग़ल्ला करदे पये हो, मैं जांनिया तुस्सी सब ठीक कर लेणे हो"। (क्या बात कर रहे हो, मैं जनता हूँ आप सब सही कर लोगे)
दो-तीन दिन रफ़ी साहब ने ज़ीनत बेगम के साथ रियाज़ किया और सब ठीक हो गया लेकिन आखिरी फैसला नज़ीर साहब को लेना था। 2-4 दिन बाद नज़ीर साहब बॉम्बे से लाहौर आये और रफ़ी साहब को सुना।
रफ़ी साहब की आवाज़ उनको बहुत पसंद आयी। मामूली नुक्ताचीनी के बाद सब कुछ फाइनल हो गया।
100 रुपए देकर रफ़ी साहब को मुंबई बुलाया गया और इस तरह रफ़ी साहब को पहला ब्रेक मिला, जिस में अशरफ खान साहब का बहुत बड़ा हाथ था। 'गुलबलोच' फिल्म 23 अगस्त 1943 को लाहौर के 'क्राउन सिनेमा' में रिलीज़ हुई।
"लाहौर से बाम्बे" -1942
के एल सहगल साहब के स्टेज शेयर, फिर रेडियो और गुलबलोच में गाने के बाद भी रफ़ी साहब महफ़िल और मेले वगैरह में कभी कभी गाते थे। मगर हमीद साहब (रफ़ी साहब के बड़े भाई के दोस्त) इस से मुतमईन नहीं थे और सोचते की रफ़ी साहब लाहौर में कुछ खास नहीं बन पायेंगे। वो चाहते थे की रफ़ी साहब और भी ऊँचा मुकाम हासिल करें और सारी दुनिया में रफ़ी साहब का नाम रोशन हो। एक मौका भी था, म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुंदर उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड देकर बॉम्बे आने की दावत दे चुके थे। मगर सब से बड़ी दिक्कत उनके वालिद साहब से थी जो गाने-बजाने के बिल्कुल खिलाफ थे। लेकिन मोहम्मद दीन साहब और हमीद भाई ने काफी समझाइश के बाद रफ़ी साहब के वालिद को राज़ी कर लिया। रफ़ी साहब की वालिदा हमेशा रफ़ी साहब की हौसला अफजाई किया करतीं थीं। उन्होंने एक तकिये में चने (Bangal Garam) भर कर रफ़ी साहब को दिए और दिल से उनकी कामयाबी की दुआ दी।
उन दिनों लाहौर से कोई सीधी ट्रैन बंबई नहीं आती थी चुनांचे पहले पेशावर जाना पड़ा, वहां से फ्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिये ट्रेन में हमीद साहब के हमराह सवार हुए। सिद्दीक़ साहब (रफ़ी साहब के छोटे भाई) और कुछ दोस्त उनको छोड़ने के लिए आये, इस तरहा रफ़ी साहब का मुंबई आने का मरहला मुक्कमल हुआ...
दोस्तो, जब रफ़ी साहब लाहौर से बॉम्बे पहुंचे तो काफी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। पहले तो बामुश्किल रहने का ठिकाना मिला।
फिलहाल रहने का ठिकाना तो मिला पर वहां पर रियाज़ करना मुश्किल काम था।
लाहौर से अपने साथ 3-4 गिलाफ तकिये (Pillow cover) में चने भर कर लाये थे वही खा कर गुज़ारा करते और रियाज़ के लिए चौपाटी चले जाते, वहां जा कर घंटों रियाज़ करते।
हमीद साहब, रफ़ी साहब के लिए काम की तलाश करते। एक दिन दोनों "दादर" इलाके से गुजर रहे थे की उन्होंने म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुन्दर को कार में जाते हुए देखा। दोनों ने उनका पीछा किया। श्याम सुन्दर जी रिकॉर्डिंग स्टूडियो (रणजीत स्टूडियो) में दाखिल हो गए। जब हमीद भाई ने स्टूडियो में जाने की कोशिश की तो दरबान ने उनको जाने से रोक दिया।
रफ़ी साहब ने अपनी जेब से श्याम सुन्दर का विजिटिंग कार्ड दरबान को दिया, उसके बाद श्याम सुन्दर जी से मुलाक़ात हुई और तब जा कर रफ़ी साहब ने श्याम सुन्दर के संगीत में अपना दूसरा और हिंदी फिल्म में पहला गाना फिल्म "गांव की गोरी" (1944) के लिए रेकॉर्ड किया। (हालाँकि नौशाद साहब के म्यूजिक में बनी फिल्म "पहले आप" (1944) "गांव की गोरी" से पहले रिलीज़ हुई) और इस तरहा रफ़ी साहब का पहली बार हिंदी फिल्म में गाने का मरहला पूरा हुआ।
और इस के बाद रफ़ी साहब ने करीब 1960 से भी जायदा फिल्मों मैं गाने गाये आज रफ़ी साहब इस दुनिया मैं नहीं लेकिन आज भी उनके के गीत नैतिक सामाजिक और भावनात्मक अवमूल्यन के इस दौर में गीत जनमानस को इंसानियत, इंसानी रिश्तों, नैतिकता और सामाजिक सद्भाव के लिए प्रेरित करते हैं। देश के एकता और अखंडता को मजबूत करते हैं। रफ़ी साहब साम्प्रदायिक सौहार्द का मजबूत प्रतीक हैं। 38 साल गुजरने के बाद भी लोग ऑन को दिल से सुनते हैं और याद करते रफ़ी साहब जैसे कलाकार कभी मरते नहीं वो अमर हैं हम सब के दिल मैं हमारी यादों मैं और उन के गाए गीतों मैं। .. "जोए रफ़ी साहब "
दीवाना ए मुहम्मद रफ़ी
मुहम्मद शाहिद खान " जयपुरी "
जयपुर - राजस्थान

thanks ................dada
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